गिजुभाई की बाल-कथाएं : सात पूंछोवाला चूहा - SupportMeYaar.com

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Tuesday, 11 July 2017

गिजुभाई की बाल-कथाएं : सात पूंछोवाला चूहा




लेखक : गिजू भाई बधेका  

अनुवाद:  काशीनाथ त्रिवेदी


कहानी : सात पूंछोवाला चूहा



एक था चूहा। उसकी सात पूंछें थीं। एक दिन उसकी मां ने उसे पाठशाला में पढ़ने भेजा। वहां चूहे की सात पूंछें देखकर लड़के उसे चिढ़ाने लगे:

सात पूंछो वाला चूहा,

सात पूंछो वाला।

सात पूंछों वाला चूहा,

सात पूंछों वाला।

चूहा रोता-रोता घर पहुंचा। मां ने पूछा, "क्यों रो रहे हो? पाठशाला से लौट

क्यों आये?"

चूहा बोला, "एं, एं एं! सब मुझे ‘सात पूंछोवाला चूहा’, ‘सात पूंछों वाला’ कहकर चिढ़ाते हैं।

मां ने कहा, "जाओ, एक पूंछ कटवा आओ। बढ़ई के घर चले जाओ।"

चूहा बढ़ई के घर पहुंचा, और एक पूछं कटवाकर लौटा। अब छह पूंछें रह गईं।

दूसरे दिन जब वह पाठशाला में गया, तो लड़के उसे फिर चिढ़ाने लगे:

छह पूंछों वाला चूहा,

छह पूंछों वाला।

छह पूंछों वाला चूहा,

छह पूंछों वाला।

चूहा ‘ऊं, ऊं, ऊं," करता हुआ फिर घर पहुंचा, और रूठकर चक्की के नीचे जा बैठा। उसकी मां ने कहा, "यह चूहा कहां चला गया? अरे, खाना तो खा लो। भूख नहीं लगी क्या?"

चूहा बोला, "मैं नहीं खाऊंगा। सब मुझे ‘छह पूंछोंवाला चूहा’, छह पूंछोंवाला’ कहकर चिढ़ाते हैं।"

मां ने कहा, "जा, फिर बढ़ई के घर जाकर एक पूंछ कटवा आ।"

चूहा बढ़ई के घर पहुंचा, और एक पूंछ और कटवा आया। अब उसकी पांच पूंछें रह गई।

दूसरे दिन वह पाठशाला गया। चूहे को आता देखकर सब लड़के एक-साथ बोले, "वह देखो, चूहे भैया चले आ रहे हैं!"

चूहे की पांच पूंछ देखकर लड़के फिर उसे चिढ़ाने लगे:



पांच पूंछों वाला चूहा,

पांच पूंछो वाला।

पांच पूंछों वाला चूहा,

पांच पूंछों वाला।

चूहा चिढ़ गया औ जोर-जोर से रोता-रोता घर पहुंचा। वहां एक पेटी पर जा बैठा। चूहे की मां ने पूछा, "तुझे अब क्या हो गया? ज़ोर-ज़ोर से क्यों रो रहा है?"

चूहे ने कहा, "सब मुझे ‘पांच पूंछोंवाला चूहा’, ‘पांच पूंछोवाला’ कहकर चिढ़ाते हैं।"

मां बोली, "जा, फिर बढई के घर जा। एक पूंछ और कटवा आ।"

चूहे ने ऐसा ही किया। अब उसकी चार पूंछें रह गईं।

जब चूहा पाठशाला पहुंचा, तो सब लड़कों ने उसको चिढ़ाना शुरू किया। चूहा बुरी तरह रोता-रोता घर आया और मुंह फुलाकर बैठ गया। मां के कहने पर उसने एक पूंछ और कटवा ली। फिर कुरता-पाजामा पहनकर और पाजामे में अपनी पूंछें छिपाकर वह पाठशाला पहुंचा।

सब लड़के कहने लगे, "आज तो चूहे भैया पाजामा पहनकर आए हैं।" लेकिन जब वह पेशाब करने बैठा तो लड़कों ने उनकी तीन पूंछें देख लीं।

सब लड़के एक साथ चिल्ला उठे:

यह तो तीन पूंछोवाला चूहा,

तीन पूंछोवाला।

इसके बाद चूहे ने तीसरी पूंछ कटवा ली। फिर भी सब उसे चिढ़ाने लगे। आखिर उसके एक ही पूंछ रह गई।

मां ने कहा, "अब तुम्हें कोई नहीं चिढ़ाएगा। अब तो तुम्हारी एक ही पूंछ रही है।"

नहा-धोकर चूहा फिर पाठशाला के लिए निकलां लेकिन लड़कों ने तो चूहे भैया को खूब चिढ़ाया। कोई उसकी पूंछ को छूता था और चिढ़ाता था:

एक पूंछ का चूहा,

भैया, एक पूंछ का चूहा।

एक पूंछ का चूहा,

जी हां, एक पूंछ का चूहा।

चूहा फिर रोता-चीखता घर आया। मां ने पूछा, "अब क्या बात है?"

चूहा बोला, "मां, मां! मुझे तो अब भी सब चिढ़ाते हैं। कहते हैं—‘एक पूंछ का चूहा, "भैया, एक पूंछ का चूहा।’ सबकी एक-एक पूंछ है, फिर भी सब मुझे चिढ़ाते हैं।"


मां ने कहा, "तो जा यह एक पूंछ भी कटवा आ।"

चूहे ने यही किया।

अब तो वह बंडा बन गया।

दूसरे दिन, चूहा पाठशाला जाने के लिए निकला। उसने सोचा, ‘अब ये मुझे कैसे चिढ़ायेंगे? अब तो मेरे पूंछ है ही नहीं।’

जब वह पाठशाला पहुंचा, तो सब लडकों ने चूहे को घेर लिया और उसका कुरता उठा-उठाकर चिढ़ाने लगे:

बड़ा चूहा, बंडा,

बंडा चूहा, बंडा।

सुनते ही चूहे भैया भाग खड़े हुए। घर पहुंचकर धरती पर लेट गए, और चीख-चीखकर रोने लगे।

मां ने कहा, "अब तुम्हें क्या हुआ? अब किसलिए रो रहे हो?"

चूहा बोला, "मुझ फिर भी सब चिढ़ाते हैं। कहते हैं—बंडा चूहा, बंडा चूहा!"

चूहे की मां ने कहा, "तो सुन, बढ़ई के पास जा, और अपनी एक पूंछ जुड़वा ला।"

चूहा बढ़ई के पास पूंछ जुड़वाने गया। जाकर बोला, "बढ़ई, बढ़ई! मेरी पूंछ जोड़ दो।"

बढ़ई बोला, "भला, कटी पूंछ कहीं जुड़ती है? जाओ, जाओ, वापस अपने घर जाओ।"

चूहे ने कहा:

मेरी पूंछ जोड़ दो, ,

नहीं तो बसूला लेकर भागूंगा।

मेरी पूंछ जोड़ दो,

नहीं तो बसूला लेकर भागूंगा।

बढ़ई ने पूंछ जोड़ी नहीं, इसलिए चूहा बसुला लेकर भागा। रास्ते में उसे एक लकड़हारा मिला। उसके पास बसूला नहीं था, इसलिए वह दांतों से लकड़ी काट रहा था। चूहे ने कहा, "भैया! तुम दांतों से लकड़ी क्यों काट रहे हो? लो, यह मेरा बसूला ले लो।"

लकड़हारा बसूले से लकड़ी काटने लगा। काटते-काटते बसूला टूट गया। यह देखकर चूहा बोला:

लाओ मेरा बसूला

नहीं तो लकड़ी लेकर भागूंगा।

लाओ मेरा बसूला

नहीं तो लकड़ी लेकर भागूंगा।

लकड़हारा बसूला कैसे देता! इसलिए चूहे भैया लकड़ी लेकर भागे। कुछ दूर जाने पर रास्ते में एक जगह उन्हें एक बुढ़िया दिखाई पड़ी। बुढ़िया चूल्हे में अपना पैर डालकर रसोई बना रहीं थी। बुढ़िया के पास जाकर चूहे भैया ने कहा, "मांजी, मांजी! अपने पैर

क्यों जला रही हो? लो, यह मेरी लकड़ी लो, और इसे जलाकर रोटी बनाओ।"

बुढ़िया ने लकड़ी चूल्हे में रखी। कुछ ही देर में लकड़ी जल गई, और रोटी बन गई। इसी बीच चूहे भैया पहुंचे और बोले, "मांजी, मांजी! मुझे मेरी लकड़ी वापस दो।"

बुढ़िया ने कहा, "भैया, अब मैं तुम्हें लकड़ी वापस कैसे दूं? लकड़ी तो जल चुकी है।"



चूहा बोला:

लाओ मेरी लकड़ी,

नहीं तो रोटी लेकर भागूंगा।

लाओ मेरी लकड़ी,

नहीं तो रोटी लेकर भागूंगा।

यह कहकर चूहे भैया रोटी लेकर भागे। भागते-भागते एक कुम्हार के भट्टे पर पहुंचे। कुम्हार वहां बैठा-बैठा गारा खा रहा था, और दोहनी में रखा दही भी। चूहे ने कहा, "अरे भैया! तुम यह गारा और दही क्यों खाते हो? लो, यह रोटी लो । दही के साथ रोटी खाओगे, तो पेट को ठण्डक पहुंचेगी।"

कुम्हार ने दही के साथ रोटी खा ली। तभी वहां चूहे भैया पहुंचे और बोले:

लाओ मेरी रोटी,

नहीं तो दोहनी लेकर भागूंगा।

लाओ मेरी रोटी,

नहीं तो दोहनी लेकर भागूंगा।

कुम्हार रोटी कहां से लाता? रोटी तो उसके पेट में पहुंच चुकी थी। चूहे भैया रोटी के बदले दोहनी लेकर भागे। रास्ते में एक अहीर का घर मिला। अहीर के पास दूध दुहने के लिए बरतन नहीं था, इसलिए वह बेचारा ओखली में दूध दुह रहा था। चूहे भैया उसके पास पहुंचे और बोले, "भैया मेरे! तुम इस ओखली में दूध क्यों दुह रहे हो! लो, यह दोहनी लो।"

अहीर ने दोहनी ली और वह दुहने बैठा। इतने मे भैंस भड़की, और उसने दोहनी को लात मार दी। दोहनी फूट गई। तभी चूहे भैया वापस आए और दोहनी मांगने लगे। बोले:

लाओ मेरी दोहनी,

नहीं तो भैंस लेकर भागूंगा।

लाओ मेरी दोहनी,

नहीं तो भैंस लेकर भागूंगा।

अहीर दोहनी तो दे नहीं सकता था, इसलिए चूहे भैया उसकी भैंस लेकर भागे। भागते-भागते एक खेत में पहुंचे। वहां एक किसान हल चला रहा

था। उसने एक बैल जोत रखा था और दूसरे बैल के बदले हल के साथ अपनी मां को जोत रखा था। चूहे भैया ने किसान को कहा, अरे ओ, अभागे! यह तुम क्या कर रहे हो? भला, अपनी मां को कोई हल में जोतता है?"

किसान बोला, "भैया, क्या करूं? मेरा एक बैल मर गया है। दूसरा खरीदने के लिए मेरे पास पैसा नहीं है।"

चूहे भैया ने कहा, "भाई, लो यह मेरी भैंस लो।"

किसान ने मां के बदले भैंस को हल में जोत दिया, और वह हल चलाने लगा। थोड़ी देर तक हल चलाया। इसी बीच भैंस को तेज धूप लगी, और वह धम्म-से नीचे गिरकर मर गई।

कुछ ही देर के बाद चूहे भैया आ पहुंचे। आकर बोले, "लाओ, मेरी भैंस।"

किसान ने कहा, "भैया! भैंस तो मर गई है। अब मैं तुम्हें भैंस कैसे दूं?"

चूहे भैया बोले:

लाओ मेरी भैंस,

नहीं तो मां को लेकर भागूंगा।

लाओ मेरी भैंस,

नहीं तो मां को लेकर भागूंगा।

फिर तो चूहे भैया किसान की मां को लेकर भागे। भागते-भागते एक गांव में पहुंचे। गांव की चौपाल के पास नट अपना खेल दिखा रहे थे।

नट का एक लड़का रस्सी पर चढ़कर नाच रहा था और कूद रहा था। चूहे भैया वहां पहुंच गए।

लड़के को रस्सी पर चलते देखकर चूहे भैया ने कहा, "अरे ओ भाई! तुम इस छोटे-से बच्चे की जान क्यों लेना चाहते हो? यह ऊपर से गिरेगा, तो इसकी हड्डी-पसली टूट जायगी।"

नट बोला, "भैया, लड़का नहीं नाचेगा, तो क्या तुम्हारी यह बुढ़िया नाचेगी?"

चूहें भैया ने कहा, "लो भाई, लो! मेरी इस बुढ़िया को संभालो। इसे रस्सी पर चढ़ाओ।"

नट ने बुढ़िया को रस्सी पर चढ़ा दिया। बेचारी बुढ़िया कांपती-कांपती रस्सी पर चढ़ी। लेकिन वह रस्सी पर नाचती कैसे? वह तो एक धमाके के साथ रस्सी पर से नीचे गिरी और वही ढेर हो गई।

चूहे भैया तो तैयार ही खड़े थे। उन्होंने नट से पूछा, "तुमने मेरी बुढ़िया को मार डाला?"

नट ने कहा, "मार क्या डाला! वह तो रस्सी पर से गिरकर मर गई। इसमें मैं क्या करता?"

चूहा बोला:

लाओ मेरी बुढ़िया,

नहीं तो ढोल लेकर भागूंगा।

लाओ मेरी बुढ़िया,

नहीं तो ढोल लेकर भागूंगा।

इतना कहकर चूहा नट का ढोल लेकर भागा। भागते-भागते रास्ते में एक छोटी टेकरी मिली। वह उस पर जाकर बैठ गया, और ढोल बजाते हुए गाने लगा:

ढम, ढम, ढमाक् ढम,

पूंछ के बदले बसूला लिया।

बसूले के बदले लकड़ी ली,

लकड़ी के बदले रोटी ली।

रोटी के बदले दोहनी ली,

दोहनी के बदले भैंस ली।

भैंस के बदले बुढ़िया ली,

बुढ़िया के बदले ढोल लिया।

ढम, ढम, ढमाक् ढम।

चूहा मस्त होकर गा रहा था और ढोल बजा रहा था। इतने में एक कौआ कांव-कांव करता हुआ आया और चूहे को ऊपर आसमान में ले उड़ा।

फिर भी चूहा तो ढोल बजाता रहा और गाता रहा:

ढम, ढम ढमाक् ढम


ढम, ढम, ढमाक् ढम।

Source : Wikisource




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