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माता सीता राजा जनक की नहीं रावण की बेटी थी, जानिए चौंका देने वाला तथ्य

माता सीता राजा जनक की नहीं रावण की बेटी थी, जानिए चौंका देने वाला तथ्य
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माता सीता के बारे में रामायण के अलावा और भी कई ग्रंथ में उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार मिथिला के महाराज जनक के राज्य में कई सालों से बारिश नहीं हुई थी जिससे चिंतित होकर राजा जनम के ऋषियों से पुछा ता ऋषियों ने बताया की जब आप स्वयं हल चलाएंगे तो ही इंद्रदेव की कृपा हो सकती है.


ऐसा भी माना जाता है की बिहार में स्थित सीतामढ़ी के पुनौरा गांव में ही राजा जनक ने हल चलाया था जहा पर उनके हल की धातु टकराकर अटक गया. उसी वक्त राजा जनक ने वहा पर खुदाई का आदेश किया और वहा से एक कलश निकला जिसके अंदर एक सुंदर कन्या थी. वैसे राजा जनक नि:संतान ही थे तो उन्होंने भगवान का आशीर्वाद मानकर उन्हें पुत्री बना लिया.


हल के फल को सित कहते है उससे टकराने के कारण कलश से कन्या बाहर आई थी इसिलिये इस कन्या का नाम सीता रख दिया. इसी घटना से हमे पता चलता है की राजा जनक की पुत्री माता सीता नहीं थी. कुछ लोग इन्हें पृथ्वी की पुत्री मानते है क्यूंकि यह धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त हुई थी.

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पर अब सवाल यह उठता है की वास्तव में माता सीता के पिता कौन है और वो कलश में सीता कैसे आई इसका उल्लेख कई सारी अलग-अलग भाषाओँ की रामायण और अन्य कथाओं में मिलता है, वैसे अद्भूत रामायण में यह बताया गया है की रावण ब्रह्माजी को प्रसन्न करके कई सारे वरदान मांग रहा था जिसमे उन्होंने एक वरदान माँगा की जब में भूलवश अपनी पुत्री से ही प्रणय की इच्छा करू तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने, रावण की ऐसी बात।


यहाँ तक उल्लेख मिलता है की जब गृत्स्मद नामक ब्राह्मण माता लक्ष्मी को अपनी पुत्री के रूप में पाने की कामना करता था तब वे हररोज एक एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता रहता था ऐसे में एक दिन ब्राह्मण कहीं बाहर गये थे तब रावण इनकी कुटिया में अचानक आ गया और यहाँ पर मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया बाद में यह कलश रावण में मंदोदरी को दे दिया और बताया की यह बेहद ही तीव्र विष है इसको कही पर छुपाकर कर रख दो.

मंदोदरी वैसे रावण की उपेक्षा से बेहद ही दुखी हुआ करती थी इसीलिए उसमे मौका देखकर कलश में रखा रक्त पी लिया ताकि उनको रावण से हमेशा के लिए छुटकारा मिल सके, पर ऐसा नहीं हुआ और इसको पिने के कारण मंदोदरी गर्भवती हो गयी और लोक लाज के डर से मंदोदरी ने अपनी पुत्री को कलश में रखकर उसे निर्जन जगह पर रख दिया और माना जाता है की जनक को यही कलश हल चलाते वक्त प्राप्त हुआ था.
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