क्या हुआ जब एक प्रेत और हनुमान जी ने करवाए तुलसीदास को श्री राम के दर्शन

शायद आप जानते होंगे की श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को तुलसीदास जयंती मनाई जाती है, तुलसीदास जी के बारे में ऐसा मानना है की कलियुग में इनको भगवान श्री राम और लक्षमण जी के दर्शन प्राप्त हुए थे.

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वैसे इनके बारे में ऐसी भी मान्यता है की वो अपने पूर्व जन्म में रामायण के रचयिता महा कवी वाल्मीकि थे, इसीलिए भगवान श्री राम ने तुलसीदास को दर्शन देने का सौभाग्य दिया था.
पर क्या आप जानते है ऐसा क्यों हुआ, यदि नहीं तो चलिए हम आको बता देते है. तुलसीदास जी को भगवान राम की भक्ति और अपनी पत्नी रत्नवती की प्रेरणा से ऐसा हुआ, तुलसीदास जी राम भक्ति में ऐसे डूबे थे की इनको दुनिया की सुध भी नहीं रही थी.

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तुलसीदास भी राम भक्ति में लीन हो कर लोगो को राम कथा सुनाया करते थे, जब वे काशी में राम कथा सुना रहे थे तब उनकी भेट के प्रेत से ही गयी और प्रेत ने ही हनुमान जी से मिलने का उपाय बताया और हनुमान जी को ढूंढते हुए तुलसीदास उनके पास पहुच गये और प्राथना की की उनको राम दर्शन करवादें.

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अब हनुमान जी में तुलसीदास को बहलाने की बहुत कोशिश की पर तुलसीदास नहीं माने तब हनुमान जी ने कहा की आपको राम दर्शन चित्रकूट में होंगे. अब तुलसीदास जी रामघाट पर पाना डेरा जमा दिए और एक दिन उनको दो सुंदर युवक घोड़े पर बैठे नजर आये और इनको देखकर तुलसीदास जी अपनी सुध-बुध को बैठे, जब वो दोनों युवक तुलसीदास जी के सामने से चले गये तभी अचानक हनुमानजी वहा पर प्रकट हुए और बोले की यह प्रभु श्री राम और लक्ष्मणजी है.

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अब तुलसीदास जी बेहद ही पछताने लगे की वो अपने प्रभु को पहचान नहीं सके, अब हनुमान जी तुलसीदास जी को सांत्वना देकर बोले कल सुबह आपको फिर से राम जी और लक्ष्मण जी दर्शन देंगे. अब सुबह तुलसीदास जी ध्यान करके घाट पर चन्दन लगा रहे थे तभी बालक के रूप में भगवान श्री राम आये और बोले "बाबा हमें चंदन नहीं दोगे".

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अब फिर से तुलसीदास भी अपनी सुध-बुध खो बैठे और हनुमान जी को लगा की तुलसीदास जी फिर से भूल कर बैठे है इसीलिए हनुमान जी ने तोते का रूप धारण किया और गाने लगे 'चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर, तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर'. अब प्रभु श्री राम ने स्वयं ही तुलसीदास जी का हाथ पकड़कर अपने माथे पर तिलक लगा लिया और खुद तुलसी दास जी के माथे पर तिलक लगाकर अंतर्ध्यान हो गये.
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