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अक्सर बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने इस महान शासक ने किए इस तरह के अनोखे काम जाने इसकी सच्चाई

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सम्राट अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व पाटलीपुत्र मे हुआ था । सम्राट अशोक सम्राट बिन्दुसार के तथा माता सुभाद्रंगी के पुत्र थे तथा सम्राट अशोक सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र थे l उन्हे मौर्य साम्राज्य का तीसरा शासक माना जाता था। सम्राट अशोक की माता चंपक नगर के एक बहुत ही गरीब परिवार की बेटी थी। सम्राट अशोक को एक सफल और कुशल सम्राट बनाने मे आचार्य चाणक्य का बहुत बड़ा हाथ है। फॉलो करें




आचार्य चाणक्य ने उन्हें एक सफल और कुशल सम्राट के सभी गुण सिखाये  


सम्राट अशोक बचपन से ही शिकार के शौकीन थे तथा खेलते खेलते वे इसमे निपूर्ण भी हो गए थे। कुछ बड़े होने पर वे अपने पिता के साथ साम्राज्य के कार्यो मे हाथ बटाने लगे थे तथा वे जब भी कोई कार्य करते अपनी प्रजा का पूरा ध्यान रखते थे, इसी कारण उनकी प्रजा उन्हे पसंद करने लगी थी।
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उनके इन्ही सब गुणो को देखते हुये, उनके पिता बिन्दुसार ने उन्हे कम उम्र मे ही सम्राट घोषित कर दिया था। उन्होने सर्व प्रथम उज्जैन का शासन संभाला l उज्जैन ज्ञान और कला का केंद्र था तथा अवन्ती की राजधानी। जब उन्होने अवन्ती का शासन संभाला तो वे एक कुशल रजनीतिज्ञ के रूप मे उभरे। उन्होने उसी समय विदिशा की राजकुमारी शाक्य कुमारी से विवाह किया । शाक्य कुमारी देखने मे अत्यंत ही सुंदर थी। शाक्य कुमारी से विवाह के पश्चात उनके पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा का जन्म हुआ ।


कहा जाता है कि अशोक का साम्राज्य पूरे भारत तथा ईरान की सीमा तथा पश्चिम-उत्तर हिंदुकश था। फिर उनका शासन धीरे धीरे बढ़ता ही गया। उनका साम्राज्य उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। परंतु कलिंग की लड़ाई मे भारी नर संहार को देखते हुए उन्होने बौद्ध धर्म को अपना लिया । उन्होने इसके बाद शांति के मार्ग को अपनाया। इस समय सम्राट एक शासक और संत दोनों के रूप मे सामने आए। उन्होने अपने साम्राज्य के सभी लोगो को लोक मंगल के कार्यो मे शामिल होने की सलाह दी। इसके बाद उनके सारे कार्य लोकहित को लेकर थे ।


अशोक सम्राट ने इसके बाद अपने धर्म के प्रचार को ही अपना मुख्य उद्देश्य माना । अपने धर्म के प्रचार के लिए उन्होने धर्म ग्रंथो का सहारा लिया तथा पत्थर के खंबों गुफाओ तथा दीवारों पर चिन्ह और संदेश अंकित करवाये। अशोक सम्राट ने 84 स्तूपो का निर्माण कराया इसके लिए उन्हे केवल 3 वर्ष का समय लगा। वाराणसी के निकट सारनाथ स्तूप के अवशेष आज भी देखे जा सकते है। मध्य प्रदेश का साची का स्तूप भी बहुत प्रसिद्ध है l

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